
टार्च पास नहीं, अंधेरे में भटक जाता हूँ।
जो सीधे रास्ते चले थे आगे निकल गए,
हम नए राह की खोज में पिछरते चले गए।

वक्त का तकाजा समझा मैं ठोकरों के बाद
लहूलुहान थी शख्सियत, खुले थे मेरे हाथ।
गर चाहते हो तुम, दामन भरा हो खुशियों से,
करो मेहनत, गुजरो सदा पुरानी राहों से।
कतरा-कतरा जिंदगी, जिहाद का ऐलान है,
हरेक रास्ता हिम्मती के, पाँव का निशान है।
उस आदमी की मिटटी होती है कुछ खास ही,
ख़ुद बनाता है जो अपनी राह भी, मुकाम भी।











